वसंत ऋतु के उल्लासपूर्ण वातावरण का एक आनंदमयी उत्सव है ‘फुलेरा दूज’। यह त्यौहार वसंत पंचमी और होली के बीच फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाया जाता है। इसे फाल्गुन माह का सबसे उत्तम और शुभ दिन माना जाता है।

हिन्दू ज्योतिष के अनुसार फुलेरा दूज एक ऐसा दिन है जो सभी दोषों से मुक्त होता है। अतः किसी भी शुभ कार्य को करने के लिए यह दिन अति उत्तम माना जाता है और इस दिन किसी भी मुहूर्त्त की आवश्यकता नहीं होती। और यही कारण है कि सभी शुभ कार्य विशेषकर विवाह समारोह फुलेरा दूज के दिन संपन्न होते हैं।

उत्तर भारत में यह त्यौहार बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। मथुरा, वृन्दावन और ब्रज क्षेत्र में इस दिन भगवान् श्री कृष्ण के मंदिरों में विशेष पूजा-अनुष्ठान किये जाते हैं। इस दिन कृष्ण मंदिरों को बहुत सुंदरता से सजाया जाता है और घर पर भी श्रद्धालु भगवान् कृष्ण को रंग-बिरंगे व सुगन्धित पुष्पों से सजाते हैं। कुछ मंदिरों में इस दिन भगवान् कृष्ण को श्वेत वस्त्र पहनाये जाते हैं, और भक्त उनके गालों और वस्त्रों पर थोड़ा-सा गुलाल लगाते हैं। यह इस बात का संकेत होता है कि भगवान् कृष्ण भी अब होली खेलने की तैयारी में हैं।

फुलेरा दूज को राधा और कृष्ण के मिलन की तिथि के रूप में भी जाना जाता है। कहते हैं कि फाल्गुन माह में गोपियों ने श्री कृष्ण और राधा रानी पर फूलों की वर्षा कर उनके प्रेम को सहर्ष स्वीकार कर लिया था। आज भी इस दिन लोग एक-दूसरे पर फूल डालकर फूलों से होली खेलते हैं।

प्रायः सभी कृष्ण मंदिरों में इस दिन भगवान् कृष्ण और उनकी लीलाओं का गान किया जाता है। मंदिरों में इस दिन भगवान् कृष्ण के दर्शनों के लिए भक्तों की भीड़ लगी रहती है। कुछ स्थानों पर इस दिन भक्त भगवान् श्री कृष्ण को विशेष रूप से पोहे से बने व्यंजनों का भोग लगाते हैं।

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